कभी कभी,,,,, बैठ जाती हूं मैं,,,,,,

कभी कभी,,,,,
बैठ जाती हूं मैं,,,,,,
उस बरगद के पेड़ के नीचे,,,,,,
जब,,,,,,,
थक जाती हूं मैं,,,,,,,
जिंदगी के सवालातो को भिंचे,,,,,
फिर,,,,,,,,
अपनी ही अंगुलियों से,,,,,,
उस धरा पर लकीरें बनाती रहती हूं,,,,,,,
चंद लम्हे,,,,,
सोचती हूं,,,,,,
फिर मिटाती हूं आंखों को अपनी मिचें,,,,,,,,
🙏🏻🙏🏻🙏🏻
फिर ,,,,,,,,
आंख खोलती हूं,,,,,,,
पल भर ठहरती हूं,,,,,,,
दिल को,,,,,,,,
तसल्ली दे कर,,,,,,,,
मैं शाखाओं को टटोलती हूं,,,,,,,
कुछ,,,,,,,
मन से बोलती हूं ,,,,,,,,
कुछ गिरे हुए पत्तों को बटोरती हूं,,,,,,
फिर दिल,,,,,
मेरा हल्का सा होता है,,,,,,,
तो उनसे रुखसत ले के मैं खुद को तोलती हूं,,,,,,,,,

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